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सूचना का अधिकार अधिनियम - 2005

संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश की गौरवमयी धरोहर एवं परम्पराओं तथा लोक एवं शास्त्रीय कलाओं के विकास में अपनी विभिन्न इकाईयों एवं योजनाओं के माध्यम से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कला एवं संस्कृति के प्रति अभिरूचि उत्पन्न करने से लेकर इसके उन्नयन एवं विकास के लिये विभिन्न रूपों में प्रोत्साहन देते हुए संस्कृति विभाग द्वारा कलाकारों के कल्याण हेतु विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का क्रियावन्यन किया जा रहा है।
प्रदेश के विभिन्न अंचलो में समयसमय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। जिनमें देश के प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ साथ युवा नवोदित कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का समुचित अवसर प्रदान किया जाता है। विभाग अपनी अधीनस्थ अकादमियों /संस्थाओं यथा उ० प्र० संगीत नाटक अकादमी, भारतेन्दु नाट्य अकादमी तथा जनजातीय एवं लोककला संस्कृति संस्थान आदि के माध्यम से भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है।
संगीत एवं नृत्य की वैज्ञानिक शिक्षण पद्घति का समाज के विभिन्न वर्गो में सहज रूप से उपलब्ध कराने की दृष्टि से भातखण्डे संगीत संस्थान, जिसे डीम्ड विश्वविनालय का दर्जा प्रदान किया गया है, के द्वारा बी० म्यूजिक की कक्षायेँ संचालित की जा रही है। संस्था द्वारा लोकनृत्य, लोकसंगीत, ठुमरी, गजल आदि की कक्षायेँ पूर्व की भाति संचालित की जा रही है। विषय स्रूची
भारत सरकार की सहायता से पुरावशेष एवं बहुमूल्य कलाकृति योजना का संचालन किया जा रहा है। जिसका अंतर्गत प्रदेश में उपलब्ध १०० वर्ष पुराने पुरावशेष का रजिस्ट्रीकरण का कार्य किया जाता है। विभाग की स्वयात्तजासी संस्थाओं जैसे आचार्य नरेन्द्र देव अन्तर्राष्ट्रीय बौद्घ विना शोध संस्थान, जैन विना शोध संस्थान, कथक संस्थान, अयोध्या शोध संस्थान आदि के माध्यम से पौराणिक कथाओं का अध्ययन, अभिलेखीकरण, शोध एवं प्रकाशन आदि का कार्य किया जा रहा है।
प्रदेश के विभिन्न विभागो एवं अर्द्घशासकीय एवं व्यक्तिगत अधिकारों व स्रोतो से प्राप्त अप्रचलित अभिलेखों के स्थानान्तरण एवं समुचित संरक्षण का कार्य उ० प्र० राजकीय अभिलेखागार लखनऊ एवं इसकी क्षेत्रीय इकाईयों द्वारा किया जाता है।
देश के राष्ट्रीय नेताओं, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों एवं दार्शनिक महात्माओं की स्मृति को जनमानस में बनाये रखने व उजागर करने के उदेदेश्य से मूर्तियों का निर्माण कराया जा रहा है। प्रदेश के वृद्घ एवं विपन्न कलाकारों को जिन्होने अपना पूरा जीवन कला एवं संस्कृति तथा साहित्य की अराधना में लगा दिया परन्तु वृद्घवस्था एवं खराब स्वास्थ के कारण अपनी जीविका उपार्जन में असमर्थ हो गया है, उन्हे मासिक पेंशन दी जाती है, जिनकी आयु ६० वर्ष से कम न हाऽ और उनकी आय समस्त स्रोतो से रू० ५००० प्रतिमाह से अधिक न हो । प्रत्येक कलाकार को रू० १००० प्रतिमाह की दर से पेंशन दी जा रही है। इसके साथ ही भारत सरकार राज्य कोटे के अंतर्गत उ० प्र० के कलाकारों को स्वीकृत पेंशन में राज्यांश के रूप में रू० ५००/ प्रतिमाह की पेंशन भुगतान की जाती है।
 
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